Monday, July 4, 2011


चौपाई:-संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।।  (36)
अर्थ : हे वीर हनुमानजी ! जो आपका स्मरण करता है, उसके सब संकट कट जाते हैं और सब पीडा मिट जाती हैं ।
गूढार्थ : तुलसीदासजी लिखते है कि हनुमानजी के स्मरण से संकट कट जाते है ।  प्रभु का स्मरण! यह जितना होगा उतना जीवन उन्न्त बनेगा ।   प्रभु के स्मरण में भी एक स्वार्थी स्मरण है, और दूसरा मधुर स्मरण हैं ।  भगवान की दी हुई स्मृति की देन (Gift) भगवान के कार्य में प्रयुक्त नहीं की तो कैसे चलेगा? संकट के समय, दु:ख में यदि भगवान याद आये तो कदाचित वह स्वार्थी स्मरण होगा परन्तु वह हलका नहीं है ।  वीतराग, निरपेक्ष, निराकांक्ष ऐसे शंकराचार्य हमारा पक्ष लेकर कहते हैं-
आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भाव येथा:
क्षुधातृर्षाता जननीं स्मरन्ति ।।
‘भुख प्यास लगती है तब बालक को माँ की याद आती है, वैसे आपत्ति में भगवान! मैं आपका स्मरण करता हूँ तो इसमें मेरी लुच्चाई (शठता) नही है । आपत्ति तथा सम्पत्ति दोनो प्रसंगो में भगवान का स्मरण होना चाहिए ।  हे प्रभो! मेरी शक्ति नहीं है फिर भी आपने क्यों भेजा? मुझसे भी अधिक बुद्धिशाली लोग होते हुए भी मुझे ही क्यों? कुछ भूल तो नहीं हो रही है न?  फिर भी भगवान के हिसाब में भूल नहीं होती अत: भगवान से भूल नहीं हुई होगी, ऐसा समझकर सात्विक स्मरण करो ।  भगवान का  मधुर स्मरण यह बहुत बडी बात है ।  भगवान की दी हुई शक्ति प्रभुस्मरण और आत्मस्मरण में ही प्रयुक्त करनी चाहिए ।

प्रभु का स्मरण किस प्रकार करेंगे? प्रारंभ में प्रभु की स्मृति न्यायदाता के रुपमें हो सकती है । हमसे कुछ उल्टा-सीधा आचरण हुआ तो याद रखो ।  नरसी भगत कहता है, ‘भोयमां पेसी भोंयरे, करीए काली बात.........तो ते जाणे जगत्नो तात’ यानी तहखाने में बैठकर भी यदि बुरी बात की तो भी जगत पिता-भगवान उसको जानते है ।  अत: उसका न्याय देनेवाले भगवान हैं ।  इसी प्रकार सज्जन बनकर आचरण करते हैं तो ‘इस सज्जनता का फल मेरे अमुक तप के कारण मिला है, मैं सज्जन रहा, अच्छा रहा इसका यह फल है ।  ऐसा विश्वास होना चाहिए ।  ‘सत्यमेव जयते।’ इसपर हमारा अटूट विश्वास होना चाहिए ।  भगवान ने मेरा कर्म अंकित करके रखा ही है ।  खराब, बुरा काम करते समय भगवान को याद रखकर करो और अच्छा काम भगवान को ‘साक्षी’ रखकर करो, कारण दुनिया तो सब भूल जानेवाली है । एकाध दिन समाजमें हमने अच्छा काम किया तो लोग एकाध हार पहनायेंगे और दूसरे दिन भूल जायेंगे। लोगों की स्मरणशक्ति बहुत कम होती है ।  महान विजय पाने पर लोगोंने नेपोलियन का सम्मान करना चाहा ।  नेताने बरामदेमें आकर लोगों को दर्शन देने के लिए नेपोलियन से कहा, तब नेपोलियन ने उत्तर दिया, ‘जो लोग मुझे आज फूलोंके हार पहिनाना चाहते हैं वे कादाचित् कल मुझे गोलियोंसे मार भी देंगे, अत: उनके सम्मान की मुझे कोई आवश्यकता नहीं ।

सत्कर्म करना है तो भगवान का स्मरण रखकर, उनके भरोसे ही करना चाहिए ।  भगवान के नामपर भगवान के लिये और भगवान के भरोसे पर किया हुआ कर्म ही सत्कर्म कहा जाता है ।  हम तो लोग अंकित करते होंगे और ‘बहुत अच्छा’ ऐसी स्तुति करते होंगे तभी सत्कर्म करते हैं ।  इतनी हमारी हीनता है। फिर हम भक्त कैसे? ‘भगवान आप ही न्याय देनेवाले हैं, ऐसी स्मृति रहनी चाहिए ।  हमारे कर्मों को देखनेवाला भिन्न, लिखनेवाला संचित करके रखनेवाला भिन्न और देनेवाला भिन्न हैं ।  मेरे कर्मों का  फल समाज नहीं अपितु भगवान ही देनेवाले हैं ऐसी समझ हुई तभी भगवान की स्मृति रखी है ऐसा कहा जायेगा। मैं दुनिया के लोगों को मूर्ख बना सकूँगा, परन्तु भगवान! आपको नहीं !
दूसरी स्मृति होती है, ‘कर्मफलदाता’ के नाते ।  भगवान क्या हाथ में तराजू लेकर, तोलकर हम सब का न्याय करते हैं? एक हाथ में सजा के िलए लकडी और दूसरे हाथ में ईनाम, ‘यह अथवा यह?’ क्या इतना ही करते हैं? आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत इतनी ही कल्पना भगवान के संबंध में एक समय पचिमी देशों में थी ।  परन्तु वास्तव में भगवान ऐसे नहीं हैं ।  दाता है ।  भगवान कर्म का फल देनेवाले हैं ।  मैने जो कर्म किया होगा उसका फल तो भगवान देते ही हैं, पर कभी कभी ऐसा लगता है कि भगवान! आप तो किसी समय अधिक दे देते हैं ।  मैने जो किया नहीं है वह भी आप मेरे हाथ में दे देते है, फिर आपको ‘कर्मफलदाता’ कैसे कहना? केवल मेरे ही कर्मों का फल देते हो, तो बैंक में, मेरे खातेमें जो रक्कम जमा होगी उसे देखकर ही बैंक का क्लार्क चेक भूनता है, वैसा ही आपने किया है ऐसा कहा जाएगा।  बैंक का क्लार्क कुछ अधिक नहीं देता ।  कौंटरपर क्लार्क चेक जाँचता है, हस्ताक्षर देखता है, कितनी रक्कम जमा है फिर पैसे देता है ।  भगवान तो उससे कुछ अधिक देते हैं ।  अच्छे कमों‍र् के फल बढाकर देनेवाले भगवान हैं ।  अत: भगवान केवल न्याय देनेवाले नहीं है, अपितु दाता हैं ।  भगवान अपनी जेब में से देते है ।  स्वयं घिसकर हमारे कर्मों को सँभालते हैं।  इसलिए भगवान की इस प्रकार की भी एक स्मृति रहनी चाहिए ।

तीसरी बात, भगवान ‘पालयिता’ पालन करने वाले हैं ।  कितने ही लोग ऐसे हैं कि वे किसी को मदद देते हैं और छूट जाते हैं ।  भगवान ऐसे नहीं है ।  रास्ते में भिखारी मिला तो हम उसे दस पैसे देकर छूट जाते हैं ।  इस पैसों से उसने कुछ खाया या नहीं, पैसे खो तो नहीं गये, रात्रि में उसके पेट में दर्द होता है या नहीं या उसने पैसों से कुछ हरामखोरी तो नहीं की? आदि सब कुछ हम देखते नहीं बैठते! हम देकर छूट जाते हैं ।  भगवान ऐसे नहीे हैे ।  वे पालक है ।
वे केवल पालन करते है ऐसा नहीं है, वे मददगार भी हैं ।  एक एक सोपान चढते चढते स्मृति करते जाओ ।  किस सम्बन्ध से भगवान के पास जाना है यह निश्चित करो ।  ये सब भगवान के रुप हैं ।  इस रीत से भगवान की स्मृति करके दर्शन करने चाहिये ।  न्यायदाता, फलदाता, पालन कर्ता व मददगार । इनसे आगे बढकर पिता के नाते स्मरण होता है ।  भगवान केवल मददगार नहीं है ।  मदद की आवश्यकता होनेपर वे आयेंगे ही ।  ‘संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बल बीरा।’ ‘आपत्सु मग्न’: माँ मददगार के रुप में आती है ।  इससे आगे का सोपान यानी भगवान की पिता के रुपमें स्मृति रखो ।  प्रत्येक रुप की, प्रत्येक फूल की भिन्न भिन्न सुगंध है। सभी भक्त एक समान नहीं है । विकसित भक्त भिन्न भिन्न सुगन्ध ले सकता है ।
कोई भगवान की भक्ति करने लगा कि हम उसको गोपियों, नरसी मेहता, याज्ञवल्क्य, शंकराचार्य आदि की पंक्तिमे बिठाकर भक्त मानने लगते हैं ।  ये सब भक्त एक ही श्रेणी के नहीं है ।  प्रत्येक फूल की भिन्न भिन्न सुगन्ध होती है, वैसे ही भगवान भी इन सभी भक्तों के पास भिन्न भिन्न रीतिसे खिलते हैं । प्रत्येक के पास अलग अलग रहते है ।  मार्ग से चलते हैं तब भिन्न भिन्न व्यक्ति का स्मरण होता है । किसीका विद्वान के नाते, दूसरे का पुलिस के नाते, तीसरे का धनवान के नाते तो किसीका पिता के नाते स्मरण होता है ।  प्रत्येक स्मृति में फरक है ।  पिता माना कि भिन्न ही भाव आता है ।  पिता के नाते अद्भूत भाव है ।  परन्तु व्यवहार में इस पिता के नाते जो स्मृति होती है उसमे भी तनिक कडुवापन आ जाता है ।  गत पीढी में पिता-पुत्र में मतभेद रहता था वैसा आज भी है ।  ‘तुण्डे तुण्डे मतिर्भिन्ना।’ अपनी अपनी डफली अपना अपना राग रहेगा ! किसको किसमें समर्पण होना है- विलीन होना है- यह स्वतंत्र बात है ।

अब, भगवान की स्मृति पिता के नाते होती है, उसकी अपेक्षा -‘सखा’ के नाते हो तो उसमें अधिक आनंद है ।  इससे भी पति के नाते हो तो उसमे अधिक आनन्द है । ‘गतिर्भता प्रभु: साक्षी।’ भगवान का भिन्न भिन्न रुपसे स्मरण करना है यह मूल बात है ।  दो स्मृतियाँ करनी है ।  एक प्रभुस्मृति और दूसरी आत्मस्मृति । ‘स्मृति’ भगवान का दिया हुआ ईनाम होते हुए भी उसका योग्य उपयोग न होने से हमें आत्मस्मृति नहीं होती ।  सारी दुनिया का करते करते मैं अपने ही को भूल गया हूँ ।  भतृ‍र्हरि राजा कहता है-
परेषां चेतासि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा ।
प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदय क्लेशकलिलम् ।।
प्रसन्ने त्वय्यन्त: स्वयमुदितचिन्तामणिगुणे ।
विविक्त: संकल्प: किमिव हि फलं पुष्यति न ते ।।
सब के मन सँभालते सँभालते मुझे अपने लिए कुछ संग्रह करना है यही मैं भूल गया हूँ और बहत्तर वर्ष का हुआ हूँ ।  पुत्र बादमें ‘पिताजी, पुज्य’ ऐसा कहते हैं परन्तु वे सब स्वार्थ के कारण कहते हैं, कारण उनको पिता से पैसे लेना होता है इसलिये ।  अन्यथा किसी को किसी के प्रति प्रेम नहीं होता । सबका करते-करते अपने लिये भी कुछ करना है ऐसी आत्मस्मृति नहीं रहती 

छोटे बालक जब प्रदर्शनी देखने जाते हैं तब वहाँ भिन्न प्रकार के खिलौने होते हैं, उनमें रम जाते हैं जापान के खिलौने तो बहुत ही अच्छे होते हैं ।  कुछ स्वयंचलित खिलौने हँसते हैं ।  तो कुछ रोते हैं । कुछ बोलते है तो कुछ मूक होते हैं ।  कुछ खिलौने अच्छा चलते हैं तो कुछ बैठे हुए ही होते हैं ।  यह सब लंबा चौडा प्रदर्शन देखने में लडकों को मजा आता है और वे भूख-प्यास सब भूल जाते हैं ।  ऐसे समय माँ याद दिलाती  है कि थोडासा खा लो ।  खाते खाते देखते जाओ ।  वैसे हमारे जीवन में दोपहर में तो आत्मस्मृति की भूख लगनी चाहिये न? हम इसका विचार ही नहीं करते ।  इस सृष्टि में भगवान के अनन्त फूल हैं, वृक्ष हैं, घर हैं, मनुष्य हैं ।  ये सब खिलौने ही हैं ।  प्रत्येक में भिन्न भिन्न भाव है ।  किसी में सुन्दर हरामखोरी दिखायी देती है ।  तो किसी मे सज्जनता! कोई बोलता है तो वह अच्छा लगता है । दूसरा बोलता है तो दुर्गन्ध फैलती है ।  इन सबकी हमें पहचान  करके हँसना है, बोलना है ।  भगवान! आपने इस सृष्टि सौन्दर्य को बहुत ही सुन्दर खिलाया है, परन्तु मुझे तो समय ही नहीं है । (No time) भुख ही नहीं लगती है ।  भगवान कहते हैं, ‘तू स्मरण कर व सँभल । ’ज्ञान तथा भाव की भूख लगती है इसलिये भगवान बीच बीचमें हमें हिलाते हैं ।  खिलौनों को देखने में तल्लीन होनेवालों को भूख  ही न लगे तो भगवान क्या करेंगे? एकाध विपत्ति भेजकर, दु:ख भेजकर तनिक झकझोरते हैं, हिलाते हैं, जगाते है। भगवान के पास हजारों मार्ग हैं ।  भगवान किस मार्ग से हिलायेंगे कह  नहीं सकते ।  सीधा सरल चल रहा संसार है, उसमें से लडका ही उठाकर ले जाते हैं ।  इसलिए भगवान कहते हैं, तू अपनी स्मृति रख वैसी मेरी भी स्मृति रख ।   आत्मा भूखी, प्यासी है ।

आत्मा को ज्ञान और भाव की भूख है ।  क्या भाव खिलाया? नही! अनेक बार वस्तु एक ही होती है परन्तु बनाने (Preparation) में फर्क के कारण रुचि में फर्क आ जाता है ।  खीर व रबडी में दूध, शक्कर, केसर होता है ।  वस्तुएं वे ही हैं पर उनकी बनाने की क्रिया से उनकी रुचि में फर्क आता है ।  इसी प्रकार व्यक्ति के प्रति हमारे भाव बदलते रहते हैं ।  कोई दलाल बाजार में मिलता है तब उसके प्रति भिन्न भाव से देखते हैं और वही दलाल सत्संग में मिलता है तब भिन्न भाव से उसे मिलते हैं ।  व्यक्ति एक होते हुए भी भाव में फर्क आता है ।  रास्ते में चलते हुए समधी मिलते हैं, फिर मित्र मिलता है ।  उसके बाद गुरु मिलते हैं ।  घर आने पर पत्नी को भी देखते हैं ।  इस प्रत्येक को देखने के बाद, मिलने के बाद भिन्न भिन्न भाव जागृत होते हैं ।  प्रत्येक में फर्क जरुर है ।   परन्तु यह भावोंका फर्क अभ्यास से जान लेंगे तो भाव के प्रति अवश्य प्रेम निर्माण होगा ।  इतना ही नहीं, अपितु कौनसा भाव रखना है ।  और कौनसा भाव वृद्धिंगत करना है यह भी समझ पडेगा ।  भाव को भी लगेगा कि इनके जीवनमें मेरी कद्र है, मेरे प्रति      (Appreciation)  है ।  भगवान के पास जैसे बैठते हैं वैसे भाव के पास भी बैठना सीखो ।  यदि जीवनमें भाव ही नहीं खिालया तो वृद्धवस्तावत्् चिन्तामग्न: जैसा जीवन सुखा जायेगा फिर ‘जगत लगा खारा रे..... कहते रहेंगे ।

जिसने जीवन में भाव का दरवाजा खोला ही नहीं उसको जगत अच्छा लगेगा ही नहीं ।  भाव को पहचानकर, उसको बनाये रखने की, वृद्धिंगत करने की, उसको लाड प्यार करने की, उसका उदात्तीकरण करने की जीवन में आवश्यकता है ।  अध्यात्म यानी ‘आत्मनि अधि इति अध्यात्मं।’

जीवन में भगवान की विविध रुपोंमें स्मृति रहनी चाहिये ।  वैसे ही आत्मस्मृति भी रहनी चाहिए, साथ ही  साथ भाव की स्मृति रहनी चाहिये ।  तुलसीदासजी लिखते हैं कि इस प्रकार उपरोक्त स्मृतियों को रखकरयदि हम भगवान का स्मरण करेंगे तो फिर हमे संकट से मुक्ति मिल जाएगी परन्तु उसके लिए भगवान का मधुर स्मरण करना चाहिए ।  तथा उपरोक्त विविध स्मृतियों को जीवन में लाने का प्रयत्न करना चाहिए ।  संकट में यदि हमें भगवान की सहायता चाहिए तो भगवान के प्रति भाव बढाकर उनसे संबंध स्थापित करना चाहिए ।  और फिर भगवान को पुकारो ।  उसका स्मरण करो तो भगवान तुरन्त दौडते आयेंगे और मदद भी करेंगे ।

आदमी को कोई न कोई दु:ख आता ही है ।  जब मुझ पर विपत्ति पडी तब जिसने मुझे उठाया, जिसने मुझे चलाया वे भगवान मेरी मदद करेंगे ।  द्रौपदी पर विपत्ति पडी तो उसने भगवान को पुकारा भगवान आये और उसे सँभाला । कोई कहेगा, यह पौराणिक कहानी है कि द्रौपदी की मदद के लिए भगवान आये और उसकी रक्षा की ।  उसके बाद क्या कभी भगवान आये हैं?

हम भगवान को पुकारते-पुकारते थक जाते हैं फिर भी वे नहीं आते, यह वास्तविकता है । कोई कहेगा, ‘भाई! भगवान को आर्तता से पुकारना चाहिए, तभी वे आते हैं, वे ऐसे थोडे आते हैं ।  जिस पर विपत्ति पडती है वह आर्तता से पुकारता है, फिर भी भगवान नहीं आते ।

कोई कहेगा, ‘भगवान को दिल से पुकारना चाहिए ।’ जब तक व्यक्ति दंभ से भरा रहता है तब तक भगवान कैसे आयेंगे? भगवान भी जांचते है कि क्या आदमी दंभ से तो नहीं पुकारता है?
भगवान! क्या आपको संभी दंभ से ही पुकारता है? भगवान! क्या आपको संभी दंभ से ही पुकारते हैं? द्रोपदी पर विपत्ति आयी तो उसने भगवान को आर्तता से पुकारा ।  कया इसी आर्तता से कितनी ही द्रोपदियोँ भगवान को नहीं पुकारती?

मैं काल्पनिक द्रौपदी का उदाहरण देता हूँ ।  एक विधवा स्त्री है । उसका पति मर गया है । इसलिए वह घर में अकेली है ।  उसका सात  वर्ष का एक ही लडका है ।  उसी पर आशा रखकर वह अपना जीवन चलाती है ।  एक दिन अचानक रात की बारह बजे उसका लडका बीमार पड गया ।  लडके को बुखार चढा है, वह होश में ही नहीं है ।  माँ लडके को गोद में लेकर बैठी है । उसने डॉक्टर को बुलाया ।  डॉक्टर ने लडके को जाँचकर कहा: ‘अब मेरे हाथ मे कुछ नही है   बस! अंतिम समय आ गया है इसलिए भगवान को याद करो ।  ऐसा कहकर डॉक्टर भी चला जाता है ।  चारों तरफ अँधेरा है ।  घर में वह अकेली ही है ।  लडके को गोद में लिया है ।  अंतिम क्षण है ।  कोई मदद करने नहीं आता । उस समय आँखों में प्राण लेकर रोते-रोते वह भगवान को पुकारती है ।  क्या यह दम्भ है?  क्या उसकी आवाज में आर्तता नहीं है? उसका दिल सच्चा है, जरा भी दम्भ नहीं है । ‘भगवान! अब केवल तुम्हारा ही सहारा है।’  इस प्रकार रोते हुए वह भगवान को पुकारती है ।  क्या भगवान आते हैं ? भगवान नहीं आते और लडका मर जाता है ।
भगवान को बुलाने में आर्तता होनी चाहिए ऐसा कहना आसान है ।  द्रोपदी के  भगवान आये थे ऐसा सुनानेवाला सुनाता है ।  और सुननेवाले सुनते हैं ।  द्रोपदी के लिए भगवान आये तो आज आर्तता से पुकारने पर भी भगवान क्यों नहीं आते है? मुझे तो लगता है कि इसका एक ही उत्तर है कि द्रोपदी की आवाज से भगवान परिचित थे, हमारी आवाज को भगवान नहीं पहचानते ।  इसके लिए ब्रम्हसुत्र पढने  की आवश्यकता नहीं है ।  कोई आदमी झूले पर बैठा हो ।  इतने में कोई नीचे से चिल्लाकर पुकारता है, परन्तु वह हिलता ही नहीं है ।  दूसरा एक भाई उसके साथ बैठा है, वह कहता कि भाई ! तुम्हे कोई बुला रहा है क्या तुमने सुना नहीे? तो वह कहता है, हाँ,! सुना न! परन्तु वह दूसरे किसी को बुला रहा है, मुझे नही । मैं बोनलेवाले की आवाज नहीं पहचानता ।

जबतक आवाज नहीं पहिचानी जाती तब तक हमारे जैसा आदमी भी झूले से नहीं उठता, तो भगवान हमारी आवाज न पहिचाने तो वे कैसे उठेंगे? हमारी आवाज भगवान को परिचित हो इसलिए ‘तस्मात् स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्’। स्वाध्याय में प्रमाद और आलस्य नहीं करना है ।   पाण्डुवों और द्रोपदी का जीवन ही प्रभु कार्य के लिए था ।  द्रोपदी ने खून की बूंद बूंद भगवद्कार्य के लिए इस्तेमाल की थी, इसलिए भगवान उसकी आवाज पहचानते थे ।  द्रोपदी के बुलाने पर भगवान तुरन्त दौडते आये। तुम्हारी आवाज भगवान से परिचित कर लो और फिर भगवान को पुकारो तो भगवान तुरन्त दौडते आयेंगे और मदद भी करेंगे ।

गीता के विचार गाँव-गाँव में पहुँचाने जानेवाले लोग अपनी आवाज भगवान से परिचित करने का प्रयत्न करते हैं ।  मेरी आवाज भगवान से परिचित होने के बाद ही भगवान को पुकारने पर तुरन्त आयेंगे इसीलिए तुलसीदासजी ने लिखा है ‘संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरे हनुमंत बल वीरा।’

Sunday, July 3, 2011

चौपाई:- और देवता चित्त न धरई । हनुमंत सेई सर्व सुख करई ।। (35)
अर्थ :हे हनुमानजी ! आपकी सेवा करने सें सब प्रकार के सुख मिलते हैं, फिर देवता की पूजा करने की आवश्यकता नहीं रहती ।
गूढार्थ : उपासना में अनन्यता की आवश्यकता है ।  तुलसीदासजी इस चौपाई द्वारा शास्त्रीय मूर्तिपूजा का महत्व समझाते हैं ।   मूर्तिपूजा वैदिक ऋषियों के द्वारा मानव को प्रदत्त अनुपम भेंट है ।  विश्व का मानव चित्त शुद्धि कर आपना भौतिक, सांस्.तिक एवं अध्यात्मिक विकास कर सके, इहलोक एवं परलोक का श्रेय सिद्ध कर सके इस दृष्टि से हमारे ऋषियों ने सरल, व्यावहारिक, बुद्धिगम्य एवं शास्त्रीय मूर्तिपूजा की आवश्यकता समझायी है । मूर्तिपूजा एक पूर्ण शास्त्र है । ( Murtipuja is a perfect science ) वह चित्त शुद्धि के लिए पूर्ण शास्त्र ( perfect science ) है । मानव अपने विकाराें को परख ले, उन्हे क्रमश: कम करे, शुद्ध करें, उदात्त करें और अन्त में विचार और विकार रहित स्थिति में रहकर ‘‘स्व’’ का सुख प्राप्त कर सके इस दृष्ट से मूर्तिपूजा की नितान्त आवश्यकता है । मूर्तिपूजा मनुष्य को मोक्ष तक ले जाती है ।

मन को पुष्ट करने के लिए सबेरे से शाम तक चलने वाली आज की गतानुगतिक मूर्तिपूजा क्या उपयोगी हो सकती है? भोग, आरती एवं प्रसाद में समाप्त होनेवाली आज की भक्ति विचारों एवं विकारों को दूर कर चित्त शूद्धि कर सकेगी? इन सारी बातों का हमें विचार करना चाहिए । ‘‘छोटे बच्चों के घर घर के खेल जैसी मूर्तिपूजा चल रही है’’ मूर्तिपूजा में अद्भूत शक्ति भरी हुई है, वह केवल प्राथमिक अवस्था का साधन नहीं है पर अध्यात्म के चरम बिन्दु तक ले जानेवाला अनमोल मार्ग है, जिससे मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है ।

आज अनेक लोगों के मन में मूर्तिपूजा यानी भगवान की खुशामद करना यही ख्याल है । मूर्तिपूजा करनेवालों को एवं उसका विरोध करनेवालों को भी वह क्यों है इसकी कल्पना ही नहीं है । मूर्तिपूजा यानी केवल भगवान की खुशामद करना नही है ।  इतना बडा विश्व ( Universe ) उसमें एक पृथ्वी का गोला, उसपर तीन भाग पानी और एक भाग जमीन, उसमें एक एशीया खंड, उसमें भारत एक छोटा देश, उस देश में एक संविभाग का मैं एक मंन्त्री ।  मैं भी हरेक की फाईल देखकर ही न्याय करता हूँ। मेरी कोइ्‍​र्र खुशामद करे यह मुझे पसन्द नहीं है तो फिर इतने बडे विश्व के सर्जक भगवान की कोई खुशामद करे तभी वह खुश हो सकता है यह बात तर्कसंगत नहीं है ।  आज की मूर्तिपूजा द्वारा लोग केवल भगवान की खुशामद कर रहे हैं ऐसा ही लगता है।
आज शास्त्रीय भक्ति की जरुरत है ।  आज की वर्तमान मूर्तिपूजा में तूलसीदल या बिल्वपत्र चढाना या अगरबत्ती या दीप प्रज्वलित करना और नैवेद्य लगाना भक्ति है, ऐसी धारणा प्रचलित है ।  इस कर्मकाणड का भी महत्व अवश्य है लेकिन भक्ति इतने में ही समाप्त हो जाती है यह मानना कहाँ तक उिचत है?
पूज्य दादा समझाते है कि मूर्तिपूजा तक सम्पूर्ण शास्त्र है (Idol worship is a perfect science)। यह बात बुद्धि से किसी को समझायी जाएगी तो आज की गतानुगतिक मूर्तिपूजा में क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा और मूर्तिपूजा विरोधी भी दिल और दिमाग से समझ लेंगे तो उनका विरोध तो रहेगा ही नहीं लेकिन संभव है कि उनका भक्त हृदय मूर्तिपूजा करने लगेगा ।

सर्वव्यापक भगवान को मूर्ति के रुप मेे ग्रहण कर मूर्तिपूजा करने की क्या आवश्यकता है यह प्रश्न सहज ही उत्पन्न होता है। मूर्ति की आवश्यकता मूर्तिपूजा के लिए है। मूर्तिपूजा द्वारा ही चित्त की एकाग्रता संभव है ।

चित्त की एकाग्रता क्या है? सामान्यत: आम धारणा यह है कि किसी भी वस्तु को एक नजर से देखने का नाम चित्त की एकाग्रता है लेकिन चित्त की एकाग्रता का इतना ही सीमित अर्थ हो तो उसमें क्या जीवन विकास संभव है? जीवन विकास का आधार मन है । ‘‘मन: एवं’ मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयो:’’। जीवन विकास करने के लिए मन पर परिणाम होना जरुरी है ।

चित्त एकाग्रता भौतिक नहीं है मानसिक है । क्योंकि चित्त जिसमें एकाग्र करना है उसीका आकार मन-चित्त को ग्रहण करना है ।  दूसरे शब्दों में कहें तो मन ही आकार खडा करता है ।  इसलिए मन यदि सर्वगुण संपन्न मूर्ति का आकार ग्रहण करे तभी मन में मूर्ति के गुण संक्रात हो सकते हैं ।

जीवन में मन काफी महत्वपुर्ण है ।  मन है तो सुनना है, मन है तो बोलना है, मन है तो सब कुछ है। मन को शांत करने पर ही नींद आती है ।  इस प्रकार इन्द्रियों के साथ मन होना चाहिए ।  इसलिए जीवन की प्रत्येक क्रिया में मन आवश्यक है ।  भोगार्थ भी मन है और मुक्ति के लिए भी मन है ।

गीता में भी भगवान ने कहा है ‘‘मन्मना भव’’ ।  व्यवहार में भी वक्ता श्रोता, पत्नी, पुत्र अधिकारी सभी  मन मांगते हैं ।  मन के बिना अनुशासनपूर्ण जीवन यान्त्रिक है । जीवन-विकास के लिए मन का शुद्धिकरण अत्यन्त आवश्यक है ।

मन को समर्थ शक्तिशाली, प्रगतिशील एवं संवेदनशील ( powerful, progressive, and scientific ) बनाना होगा ।  ऐसा मन किस प्रकार बनायेंगे? उसके लिए मन का  रंग बदलना पडेगा ।  मन जहाँ से आया है   वहाँ यानी भगवान में जोड देने से, उसका रंग बदल जाएगा ।

मन के दो भाग है।  एक ‘‘ज्ञ’’ (Experienced state of mind) दूसरा ‘‘अज्ञ’’ (Inexperienced state of mind ) मन का केवल एक चतुर्थांस भाग का हमें पता चलता है, तथा मन का तीन चतुर्थांस भाग अज्ञात है ।  मन के तीन चतुर्थांस की शुद्धिकरण के लिए शास्त्रकारों ने चित्त एकाग्र करने की सलाह दी है ।  इस प्रकार जीवन-विकास के लिए मन का शुद्धिकरण, मन का रंग बदलने के लिए मूर्तिपूजा की आवश्यकता ऋषियोंने आचार्यों ने समझायी है ।  मूर्तिपूजा भगवान की खुशामद (Flattery) नहीं है । ऋषियों ने मन को बदलने के लिए मूर्तिपूजा और उसके द्वारा चित्त-एकाग्रता का मार्ग दिखाया है । मन ही मूर्ति का आकार लेता है तब उसे ही एकाग्रता कहते हैं ।  ऐसी एकाग्रता अधिक समय तक टिकनी चाहिए ।  मन जब मुर्ति का आकर लेगा तभी मूर्ति के-भगवान के गुण मन में संक्रात होंगे।  फलत: मन शुद्ध होगा ।  चित्तएकाग्रता से चित्त-शुद्धि होनेपर जीवन का विकास भी होता है ।

मनुष्य सुख और विकास इन दो बातों की हमेशा अपेक्षा करता है ।  सुख के दो प्रकार हैं एक वस्तुनिष्ठ सुख (Objective happiness) और दूसरा आत्मनिष्ठसुख (Subjective happiness) वस्तुनिठ सुख (Objective happiness) में सुख का आधार व्यक्ति के सामने स्थित वस्तु या व्यक्ति है ।  इस सुख में लाचारी है, क्योकि सुख का आधार अन्य वस्तु या  व्यक्ति है । पत्नी को मुस्कराती देखने के लिए दिन-रात प्रयत्न करना पडता है ।  इतनी लाचारी के बाद भी यदि वह सुख प्राप्त हो तो हमारा अहोभाग्य! इस प्रकार वस्तुनिष्ठ सुख में लाचारी है, पराधिनता है ।

मानव की बुद्धि का विकास ( Intellectual development ) हो तभी पराधीनता पीडित करती है । मनुष्य को सुख चाहिए नियमित सुख चाहिए, कभी समाप्त न होनेवाला सुख चाहिए, ये सभी सुख की उत्तरोत्तर अपेक्षाएं हैं ।  बौद्धिक विकास के बाद ही मनुष्य अंतिम स्वाधीन सुख की अपेक्षा करता है । मनुष्य को टैक्सी से अपनी कार ज्यादा पसंद होती है उसमें स्वाधीनता का सुख हैै। ‘‘ मै चाहू तब प्राप्त कर सकता हूँ’ यह भाव स्वाधीन सुख है ।

मनुष्य को आत्मनिष्ठ सुख ( Subjective happiness ) किस तरह मिल सकता है इसका अनुभव कराने के लिए भगवान के नींद बख्शी है ।  नींद मे हमें आत्यान्तिक सुख ( Absolute happiness ) जैसा ही सुख प्राप्त होता है ।  नींद का अर्थ इतना ही है कि ( We want to forget every thing ) नींद में कुछ भी नहीं रहता ।  न पैसा, न संबंध न घर ‘‘मैं’’ भी नहीं यह सब चला जाता है, तभी नींद आती है ।

नींद में कुछ भी नहीं, खाते-पीते नहीं, फिर भी हम सुखी रहते हैं ।  ‘‘सारे विषयों को फैंककर तू आनन्दमय हो सकता है। ‘‘इसका मार्गदर्शन करने के लिए भगवान ने नींद बख्शी है ।  परन्तु सुप्तावस्था का यह सुख है ।  ऐसा ही आत्मनिष्ठ सुख ( Subjective happiness ) जागृत दशा में प्राप्त करने के लिए मूर्तिपूजा, चित्त-एकाग्रता है ।

इस प्रकार मूर्तिपूजा की आवश्यकता आध्यात्मिक, सांस्.तिक एवं भौतिक दृष्टिसे है ।  समग्र विश्व के विषय छोडकर चित्त एकाग्र करने से मनुष्य आत्मनिष्ठ सुख ( Subjective happiness ) प्राप्त करता है । और साथ ही साथ मन को भगवान में एकाग्र करने से उसका मन भगवान के गुणों को पकड कर शक्तिशाली, प्रगतिशाील एवं संवेदनशील ( Powerful, progressive, sensitive ) बनता है । फलत: जीवन का सर्वांगीन विकास होता है ।

मनोविज्ञान कहता है कि मन ग्रहणशील ( Receptive ) है ।  मन जिसमें लगता है वैसा ही होता है । जो सतत पैसे का चिन्तन करता है वह जड बनता है ।  जो स्त्री का चिंतन करता है वह स्त्रैण बनता है। वेदान्त के कीट-भ्रमर न्याय के अनुसार मनुष्य का मन जिसका चिंतन करता है, उसके समान ही हो जाता है ।  ‘‘अमृतोस्मि’’ कहकर अमृत का चिन्तन करनेवाला अमृतवृत्ति प्राप्त करता है । जबकि मुर्देका चिन्तन करनेवाला मृत बनता है ।
कीटो भ्रमर संयोगे भ्रमरो भवित धुवम् ।
मानव: शिव योगेन शिवो भवति निश्चितम् ।।
‘‘कीट सतत भ्रमर का चिन्तन करने से भ्रमर बन जाता है ।  उसी प्रकार शिव के सहवास से मनुष्य शिव बन जाता है ।  भगवत्स्वरुप में मन स्थिर कनेवाला मनुष्य दिव्य बनता है ।’’

रामायण में एक दन्त कथा है ।  सीता माता अशोक वृक्ष के नीचे विचार में खोई बैठी थी । उस समय त्रिजटा उसके पास जाकर पूछती है, ‘‘क्या विचार कर रही है? ’’सीता जवाब देती है, ‘‘हाँ मेरे सामने एक समस्या है ।  यदि वेदान्त का कीट-भ्रमर न्याय सत्य हो तो, सतत राम का चिन्तन करने से मैं राम बन जाऊँगी तो क्या होगा?’’ त्रिजटा कहती है, ‘‘बहुत अच्छी बात है! आप यदि राम बन जायेंगी तो राम को यहाँ आने की जरुरत ही नहीं पडेगी’’ तब सीता कहती है, ‘‘यह कैसे हो सकता है? मैं राम हो जाऊँगी तो हमारा दाम्पत्य सुख चला जाएगा । मुझे राम नहीं बनना है ।  मुझे राम की होकर रहना है । ‘‘त्रिजटा होशियार थी ।  वह कहती है, आपकी यही समस्या है न? तब आपको चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नही है ।’’ सीता ने कहा क्यो ?’’ उसने कहा, जिस प्रकार आप यहाँ राम का चिन्तन करती हैं । उसीप्रकार राम वहाँ आपका चिन्तन करते होंगे ।  फलत: राम सीता हो जाएंगे और आप राम हो जाएंगी ।  राम सीता होंगे इसलिए आपका दाम्पत्य सुख नष्ट नहीं होगा ।
इसप्रकार मन को यदि भगवान जैसा बनाना हो तो भगवान का ध्यान धरना जरुरी है ।  भगवान ने मूर्तिपूजा का महत्व (सगुण साकार भक्ति का महत्व ) गीता के बारहवे अध्याय में बहुत ही अच्छी तरह समझाया है ।
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता: ।।
                         (गीता 12-2)
(‘‘जो मुझमें मन लगाकर और सदा समान चित्तवाले रहकर परम श्रद्धा से मेरी उपासना करता है, वह मेरी (सगुण साकार भक्ति का महत्व ) गीता के बारहवे अध्याय में बहुत ही अच्छी तरह समझाया है ।
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मता: ।।
                          (गीता 12-2)
(‘‘जो मुझमें मन लगाकर और सदा समान चित्तवाले रहकर परम श्रद्धा से मेरी उपासना करता है, वह मेरी दृष्टि से सबसे श्रेष्ठ योगी है।’’)

उपर्युक्त श्लोक में भगवान ने मूर्तिपूजा का सम्पूर्ण रहस्य बता दिया है । ‘‘मयि मन: आवेश्य’’ इसमें ‘‘मयि’’ (मुझमें) शब्द सगुण साकार के संदर्भ में ही प्रयुक्त हुआ है ।  निराकार में चित्त एकाग्र करना कठीन है । ‘‘हमारे घर की कुर्सी’’ ऐसा बोलते ही तुरन्त हमारे ध्यान में कुर्सी आ जाती है, क्योंकि उसमें गुण और आकार है परन्तु ‘‘हमारे घर का आकाश’’ ऐसा कहने के बाद कुछ  भी दृष्टि समक्ष खडा नहीं होता ।  केवल विचार में भी चित्त एकाग्र करना हो तो भी परेशानी होती है ।  तो फीर अलौकिक शक्ति में सरलता से चित्त एकाग्र कैसे हो सकता है? उपर्युक्त श्लोक में भक्ति का मेरुदण्ड दर्शाया गया है ।

मूर्ति में हमें एकाग्र होना चाहिए ।  जिसमें हम एकाग्र होते हैं उसे सर्वगुण संपन्न मानना चाहिए ऐसा आग्रह है ।  क्योंकि उसका प्रभाव हमारे मन पर होनेवाला है ।  इसी कारण विभिन्न मूर्तियोंं की उपासना और अर्थ समझाया गया है ।  ‘‘उपास्यानामनियम:। साधनानामकेता’’।

मूर्ति कौनसी लेनी चाहिए इसका निर्णय करने के लिए उपासक (साधक) स्वतंत्र है ।  एक मार्ग निश्चित कर लेना चाहिए ।  हमें कहां तक जाना है और कौनसा रास्ता पकडना है ।  इसका विचार किया जाना चाहिए ।  छोटे स्टेशन में एक ही प्लेटफार्म होता है ।  इसलिए चढने-उतरने की झंझट नहीं रहती । सभी बराबर चढेंगे कोई छूटेगा नहीं, परन्तु बोरीबन्दर जैसे स्टेशन में अनेक प्लेटफार्म हैं । वहाँ निश्चित करना पडता है कि हमें कहां जाना है ।  हार्बर लाईन से या मेन लाईन से कसारा तक या कर्जक तक । किस तरफ जाना है इसका निर्णय करके ही ट्रेन में बैठना होता है ।  इसी प्रकार जीवन-विकास के लिए एक निश्चित मूर्ति लेकर मन के शुद्धिकरण की आवश्यकता रहती है ।  मन के शुद्धिकरण के लिए सर्वगुण सम्पन्न मूर्ति में चित्त एकाग्र करना चाहिए ।  हम यदि हनुमानजी के उपासक हैं तो हमें केवल हनुमानजी की मूर्ति में ही चित्त एकाग्र करना चाहिए तो ही हममें हनुमानजी के दिव्य गुण संक्रात होंगे तथा हमें परमोच्च सुख की प्राप्ती होगी ।  इसीलिए तुलसीदासजी ने लिखा है ‘‘और देवता चित्त न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई’’।  इसमें तुलसीदासजी का एक ही देवता का इष्ट रखने का आग्रह है ।  चित्त एकाग्र करते समय एक ही रुपमें चित्त एकाग्र करो ।

हम किसी दिन अकेले बैठते ही नही! बैठते हैं तब भूत, भविष्य या वर्तमान लेकर ही बैठते हैं ।  कितने ही लोग भूतकाल तथा भविष्य काल में ही मग्न होते है, मनोराज्य में ही मग्न होते हैं । अकेला बैठकर भूत, भविष्य, वर्तमान को भूलना पडेगा तब कहीं मानसिक मूर्ति बना सकोगे ।  उस मूर्ति में सारी शक्ति होगी यह मानसिक कल्पना है ।  मन की यह मानसिक स्थिति (pshycological treatment) है। इससे मन प्रभावी बनेगा ।  इसीको कहते हैं पार्थिव पूजा! आज पार्थिवपूजा का इतना अर्थ रह गया है कि गणेशमूर्ति बनाना, उसकी पूजा करना और फिर विसर्जन कर देना ।  यह पार्थिव पूजा नहीं है ।

इस सृष्टि में मूल में सत्व, रज और तम ये तीन गुण हैं ।  इसी कारण मनुष्य भी त्रिविध प्र.ति के होते हैे ।  कुछ सात्विक वृत्ति के, कुछ राजसी वृत्ति के तो कुछ तामसी वृति के ।  भिन्न भिन्न प्र.तिवाले मनुष्य भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण लेकर चलते हैे ।  अत: इनकी ईश अर्चना भी उनकी प्र.ति के कारण भिन्न भिन्न होती है इसलिए इस संसार मेे मनुष्य भिन्न-भिन्न देवताओंका पूजन करते हैं ।  महिम्न स्तोत्र में पुष्पदंत कवि कहते हैं- ‘‘रुचीनां वैचित्‍र्याऋजु कुटिल नानापथजुषां’’ लोगों के रुचि-वैचित्‍र्य के कारण ही वे भिन्न-भिन्न देवताओंका पूजन करते हैं । लोगों की प्रकृति में अंतर होने के कारण उनकी ईश-कल्पना में भी अन्तर रहेगा ही ।  इसलिए किस आकार में, किस स्वरुपमें ईश्वरका पूजन करना चाहिए इस सम्बन्ध में शास्त्रकारोंने कोई आग्रह नहीं रखा ।  हमारे शास्त्रकार कहते हैं, ‘‘आपके दिल में जो बसे वही मूर्ति ले लीजिए और श्रद्धा से भक्ति कीजिए ।  हमारी संस्कृति में यहाँतक स्वातंत्‍र्य है कि बाप शैव हो तो पुत्र वैष्णव हो ।  इसके फल स्वरुप कुछ लोग शिव को मानंगे और कुछ लोग विष्णु को ।  अज्ञान के कारण उनके बीच झगडा होता इस झगडे को मिटाने के लिए भगवान कहते हैं कि-
यो यो यां यां तनु भक्त: श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धा तामेव विद्धाम्यहम् ।।
सतया श्रद्धय युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हितान् ।।
‘‘जो व्यक्ति जिस देव का भक्त होकर श्रद्धा से उसका पूजन करने की इच्छा करता है उस व्यक्ति की उस देव के प्रति श्रद्धा को मैं दृढ करता हूँ’’  ‘‘श्रद्धा दृढ होने पर वह व्यक्ति उस देव का पूजन  करता है और मेरे द्वारा निर्धारित उस व्यक्ति की वांछित कामनाएँ  उसे प्राप्त होती है ।’’ इस दृष्टि से देखने पर मूर्ति को परम्परा का समर्थन प्राप्त है ऐसी हमारे आराध्य देव की मूर्ति में ही चित्त सरलता से एकार्ग हो सकता है ।

शास्त्रकार का कथन है कि हमारे मन का बहुत बडा भाग अज्ञात है ।  ज्ञात मन का छोटा हिस्सा भी हम अपने अपने निमंत्रण में नहीं रख सकते, तो विशाल अज्ञात मन पर कैसे नियंत्रण कर सकेंगे? मनोनिग्रह कितना कठीन है यह बात गीता में अर्जुन ने भी भगवान के समक्ष प्रस्तुत की है ।
चंचल हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।।
                        (गीता 6-34)
‘‘ हे कृष्ण! मन बलवान, चंचल, बलपुर्वक खींचनेवाला और आसानी से वंश में नहीं हो सकता। इसलिए मन को नियंत्रण में रखना वायु को रोकने के बराबर है।’’ अर्जुन के इस प्रश्न का जवाब देते हुए भगवान  कहते हैं ।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृहते ।।
                   (गीता 6-33)
हे महाबाहु अर्जून! सचमुच मन चंचल है एव निग्रह करने में कठीन है ।  फिर भी सतत अभ्यास एवं वैराग्य से हे कुन्तीपुत्र! उसे वश में किया जा सकता है ।  योगदर्शनकार ने इस प्रकार के दृढ अभ्यास को बहुत ही महत्व दिया है ।  मन को विशुद्ध करने का अभ्यास सतत दीर्घकाल पर्यन्त एवं सद्भावपूर्वक चलना चाहिए ।  यह अभ्यास कैसे किया जाय यह एक बडा प्रश्न है । इस अभ्यास योग में पाँच बातें अपेक्षित है- 1) आदरबुद्धि 2) दृढता 3) सातत्य 4) एकाकीभाव और 5) आशारहितता

1) आदरबुद्धि :- प्रभु के लिए आत्यन्तिक प्रेम होना चाहिए ।  इसी प्रकार चित्त एकाग्रता के साधन मार्ग पर भी अन्त:करण का सच्चा भाव होना चाहिए ।
2) दृढता :- दृढ मनोबल एवं निश्चय ही अभ्यासयोग में सहायक तत्व है । कितने ही प्रलोभनों के बीच अभ्यास चालू रखना महत्वपूर्ण है । ‘‘चित्तएकार्ग करने के लिए मै बैठूंगा ही’’ ऐसा आग्रह होना चाहिए।
3) सातत्य- अभ्यास में सातत्य रहना चाहिए ।  सफलता जल्दी नहीं मिलती इसलिए थककर सातत्य तोडना नहीं चाहिए ।  किया हुआ परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता ।  स्वल्पमस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्- इस गीता वाक्य पर दृढ श्रद्धा होनी चाहिए ।
4) एकाकी भाव:- अकेले बैठने की आदत डालनी चाहिए ।  भूतकाल (विगत स्मृति) एवं भविष्यकाल छोडकर बैठना भी आना चाहिए ।  नि:सर्ग भगवान के बाद ( Next to god ) विशुद्ध तत्व है, इसलिए ऋषि निसर्ग में जाकर बैठते थे ।
5) आशारहितता :- भावी स्वप्नों में खो जाना मन का स्वभाव है । इसलिए आशारहित होने के लिए कर्म करने के बाद उसके फल भगवान को सौंप देना चाहिए ।  गीताकार ने सारी बाते संक्षेप में समझायी है-
योगी युंजीत सततम् आत्मानं रहसि स्थित: ।
एकाकी   यतचित्तात्मा   निराशीरपरिग्रह:  ।।
योगी को एकान्त में स्थिर बैठकर अकेले रहना चाहिए और मन, इन्द्रिय तथा शरीर को नियमन में रखकर, सर्व तृष्णाओं से रहित होकर एवं संग्रह-वृत्ति से दूर रहकर आत्मा को निरन्तर परमात्मा में सावधानी से एकाग्र करना चाहिए अर्थात् परमात्मा के साथ  अपनी एकता स्थापित करने का प्रयत्न करना चाहिए । ऐसा दृढ अभ्यास जब होगा तभी मन शुद्ध हो सकेगा ।  ऐसा शुद्ध मन और बुद्धि भगवान में जो स्थिर करता है उसका विकास निश्चित ही है। उसमें संशय रखने की गीताकार भी स्पष्ट ना कहते हैं ।

जब तक मन कमजोर हो तब तक भुक्ति, भक्ति और मुक्ति भी संभव नहीं है ।  मन को स्वस्थ समर्थ बनाने का, शुद्धकरनेका, विकारों के उध्‍र्वीकरण (Sublimation) का एक ही रास्ता है-शास्त्रीय मूर्तिपूजा ! मूर्तिपूजा के बिना मन:स्वास्थ्य संभव ही नहीं है ।
जैसी जिसकी मन:स्थिति, वैसी उसकी ग्रहणशीलता ।  इसलिए मन:स्थिति स्थिर होनी चाहिए । अत: एक घंटा चित्त एकाग्र करना हो तो चौबीस घंटे मन की ओर ध्यान देना पडेगा ।  इसलिए ही प्रात:काल सबसे पहले मूर्ति का ध्यान धरना आवश्यक है ।  इसीलिए तुलसीदासजी लिखते हैं कि हनुमानजी के उपासकों को केवल हनुमानजी की मूर्ति में चित्त एकाग्र करना चाहिए उसके लिए उपरोक्त बातों का मनन चिंतन कर उसके लिए अभ्यास करना चाहिए तो ही हमें आत्मनिष्ठ सुख की प्राप्ती होगी ।  इसलिए लिखा है ‘‘और देवता चित्त न धरई । हनुमंत सेई सर्व सुख करई।’’


चौपाई:- अंत काल रघुबर पुर जाई । जहां जन्म हरि भक्त कहाई ।।  (34)
अर्थ :अन्त समय श्री रघुनाथजी के धाम को जाते हैं और फिर भी मृत्यलोक में जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्रीराम भक्त कहलायेंगे ।
गूढार्थ : तुलसीदासजी इस चौपाई द्वारा मृत्यु का सिद्धान्त समझाते हैं ।  हमारा अन्तकाल होता ही नहीं है, प्रयाणकाल होता है ।  हम मरेंगे तो दूसरा जन्म लेंगे । अन्तकाल का अर्थ यह है कि अब दूसरा जन्म लेना नहीं है । इसलिए गीता में दो भिन्न भिन्न शब्द प्रयुक्त किये है । अन्तकाल और प्रयाणकाल। ‘प्रयाणकाले मनसा चलेन।’ अन्तकाल उसीका होता है जिसको फिर से जन्म न हो ।  ‘यद्गत्वा न निर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।’ वह वहाँसे वापीस नहीं आता ।
जीवन मे मृत्यु है । मृत्यु होनी ही चाहिए। मृत्यु में काव्य खडा करनेवाला, मृत्यु का काव्य बतानेवाला गुरु है । मृत्यु है इसलिए जीवन है । मृत्यु को भगवान ने ही बनाया है । एक बार मैं क्रिकेट मैच देखने गया था ।  मैच देखते देखते मैं पूरी जानकारी हासिल कर रहा था, इतने में विकेट के पीछे खडे आदमी के बारे मे पूछा कि यह कौन है? मेरे पूछने पर उसने कहा, ‘यह विकेट कीपर है।’ मैना पूछा, ‘विकेट कीपर का कौनसा काम है? उसने कहा, जब बैट्समन क्रीज ( Crease ) छोडकर बाहर निकल जाय तो यह विकेट तोड देता है, और बैट्समन आऊट होता है।  मुझे आश्चर्य हुआ मैने पूछा जो विकेट तोडता है ( Break  करता है) उसे विकेटकीपर क्यों कहते हैं? उसे तो विकेट ब्रेकर कहना चाहिए। उसने कहा, ‘मुझे मत पूछो।’ मै स्वयं सोचने लगा मुझे लगा यह खेल ब्रिटिश लोगों का बनाया हुआ है, और बहुत अच्छा है ।  विकेट गिरनेवाली है इसलिए जीवन में आनन्द है ।  जीवनमें चैतन्य है, प्राण है वह विकेट गिरती है इसलिए है ।  समझो कि विकेट को सीमेंट से पक्का बना दिया जाय तो वह गिरेगी ही नहीं और विकेट गिरेगी ही नहीं तो खेल ही समाप्त हो जायेगा ।  फिर खेल कैसा? इसी प्रकार जीवन में मनुष्य की विकेट गिरती है  (वह मरता है) इसीलिए जीवन में आनंद है, स्वाद है ।  जीवन का आनंद इसी को कहते हैं    विकेट कीपर का महत्व, खेल का आनंद उसने संभाला है ।  इसीलिए उसे विकेट कीपर कहते हैं। ऐसा ही भगवान भी करते हैं।

मृत्यु यह जीवन में अटल घटना है ।  संशोधन करके अथवा औषधियों का सेवन करके मनुष्य रोग का प्रतिकार करने की शक्ति बढा सकता है, अथवा मृत्यु को किंचित टाल सकता है, परन्तुु मृत्यु यह निश्चित घटना है ।  वैसे तो प्राणायाम से भी आयु अल्प मात्रामें बढायी जा सकती है । ‘प्राणायाम द्वारा अमुक एक संख्यामें वासोच्छ्वास रोको’ इसका अर्थ जीवन की अविधि में जितने वास लेने है उनकी समय मर्यादा में वृद्धि हो सकती है, परिणाम स्वरुप उतनी मात्रा में अधिक आयु प्राप्त होती है, परन्तु आज नहीं तो कल जगत को छोडना ही होता है ।

तुम मृत्यु से छुटकारा पाओगे ऐसा कोई भी शास्त्र कभी भी नहीं कहता है ।जन्म से तुम छूट सकते हो यह शास्त्रीय बात है ।  जन्म से छूट गये यानी मृत्यु से निसर्गत: ही छूट गये । हममें स्थित वासना बंद हुई, शुद्ध हुई तो फिर से जन्म नहीं मिलेगा ऐसा होना संभव है,  तर्कयुक्त ( Logical ) है। शास्त्रीय             ( Scientific ) भी है ।  परन्तु जिसने जन्म लिया उसे जाना ही पडेगा यह सृष्टि का िनयम है ।  कृष्ण भगवान को भी यह नियम लागू होता है, फिर भले ही ‘उन्होने देहोत्सर्ग किया’ ऐसा कहो ।  ये महान लोग स्वयं देह को छोडते है, और हमारे जैसे लोगों को देह छोडकर चला जाता है, परन्तु सभी को अन्त में जगत्् से जाना तो पडता ही हैं।

जन्म को या तो रोक सकते है, बदल सकते हैं अथवा दैवी बना सकते हैं, ‘जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई’।  सामने दीख रही वस्तु ( Object ) का बुद्धिपर परिणाम होता है और उसके परिणाम स्वरुप यदि चाह-अनचाह ( Likes and dislikes ) हमने अपनी बुद्धि में निर्माण नहीं होने दिये तो पुनर्जन्म (Rebirth ) नहीं मिलेगा ।  इस रीति के भगवान का रुप पहिचानो । यह यदि पहचानेंगे तो मृत्युपाश तोड सकेंगे ।  मृत्यु का रुप मंगलकारी बनेगा । कबीर कहता है वैसा-
कर ले श््ंगार चतुर अलबेली साजन के घर जाना होगा ।
मिट्टी ओढावन मिट्टी बिछावन मिट्टी में मिल जाना होगा ।।
नहा ले धो ले शीश गुँथाले फिर वहाँ से नहीं आना होगा ।
कर ले शृंगार चतुर अलबेली साजन के घर जाना होगा ।।
मृत्यु यानी पति से मिलने जाना’ अर्थात जितनी उत्सुकता से स्त्री अपने पति से मिलने जाती है उतनी उत्सुकता रखना ।

सभी को मृत्यु का डर है और मृत्यु का डर सभी के पीछे लगा है । जगत में किसी को मृत्यु की अपेक्षा नही है ।  फिर भी मृत्यु किसी को छोडती नही है ।  भगवान श्री.ष्ण इस जगत में जन्मे, मगर उन्हे भी जाना पडा ।  हम, ‘भगवान निजधाम गये’ अथवा ‘भगवान ने लीला की’ ऐसा बोलते हैं ।  यह बात अलग है । जीवन में अमरत्व प्राप्त करना है ।  मृत्यु सभी को भयानक लगती है ।  ‘अब तो मृत्यु आएगी तो अच्छा’’ ऐसा बोलनेवाले भी ऊपर से ही बोलते हैं ।  इस सृष्टि से निराशा आनेपर लोग कहते हैं  ‘हमें भगवान अब क्यों उठाते नही?’ मगर वे ऐसा ऊपर ऊपर से बोलते हैं ।

भक्तजनों की भगवान के पास यही माँग है- विना दैन्येन जीवनं अनायासेन मरणम्’ जीवन दैन्यरहित होना चाहिए और मृत्यु अनायास आनी चाहिए ।  गीता में भगवान ने कहा है: प्रयाणकाले मनसा चलेन प्रयाणकाल में अचल मन से जाना चाहिए ।  जगत तो सभी को छोडना है, मगर जाते समय मन अचल रहना चािहए ।
मनुष्य को इहलेाक की मूर्खतापूर्ण आकांक्षा है ।  एक रुमाल यदि बस में भूल गये तो सारा दिन मन बैचेन रहता है ।  तो सब कुछ जगत में छोडकर जाते समय किती बैचेनी आती होगी? भगवान ने सृष्टि ऐसी बनायी है कि सभी को सब कुछ छोडकर जाना पडता है ।  उसकी योग्य रोकथाम होनी चाहिए अथवा मृत्यु की भयानकता कम की जानी चािहए ।
मृत्यु में भयानकता लगती है इसका कारण क्या है? मृत्यु होने पर जहाँ जाना है वह स्थान मालूम नहीं है ।  दूसरा वहाँ मेरा क्या होगा वह मुझे मालूम नहीं, क्योंकि मैने कुछ नहीं किया है ।  परदेश में किसीसे रिश्ता हुआ हो, मगर परदेशी चलन की व्यवस्था होने पर ही परदेश जाया जा सकता है ।  उसके सिवा परदेश नहीं जाया जा सकता ।  तो फिर परलोक से रिश्ता जोडा न हो, वहाँ के चलन की व्यवस्था न की हो तो कैसे परलोक जाओगे? पति-पत्नी साथ ही मर जांए तो भी परलोक में जाने के उनके मार्ग अलग होते हैं ।  रघुवंश में कहा है:
रुदता कुत एव सा पुनर्थवता नानुमृतापि लभ्यते ।
परलोकजुषां स्वकर्मभिर्गतयो भिन्नपथा हि देिहनाम् ।।(रघुवंश 8-85)
(रोकर भी तु उसे पुन: कहाँ से प्राप्त कर सकेगा? उसके पीछे मरकर भी तू उसे नहीं पा सकेगा क्योंकि मरे हुए प्राणियो की गति अपने अपने कर्मों के अनुसार भिन्न होती है।)

एक ही घर के दो आदमी साथ ही मर जाएं तो भी वे एक ही मार्ग से नहीं जाते ।  वे उत्क्रांतिवाद के नियम ़( Law of evolution) के अनुसार अपने अपने मार्ग से जाते है ।  मरने के बाद मेरा क्या होगा इसका क्या होगा इसका विचार आते ही मन बैचेन हो जाता है    जहाँ जाना है, वहाँ रिश्ता न जोडा हो तो हमारे खाने की व्यवस्था कौन करेगा ?  मुंबई से दिल्ली जाने में आनन्द कब आता है? दिल्ली स्टेशन पर अपने लोग लेने आए, रहने-खाने की अच्छी व्यवस्था हाें तो आदमी दिल्ली आनंद से जाता है ।  जिसकी ऐसी व्यवस्था नहीं होती वह दिल्ली जाते समय डरता है, मृत्यु की भी ऐसी ही भयानक समस्या है ।

मृत्यु निश्चित रुपसे भयानक लगती है, फिर मरनेवाला चाहे भक्त, ज्ञानी या अज्ञानी हो ।   मृत्यु भयानक है इसमें शंका नही है ।  मृत्यु की शीतलता काव्य में दिखाई देती है ।मगर वास्तव मे मृत्यु शीतल नही है ।  अत: कवि मृत्यु को रुपक देता है ।  मृत्यु की सबसे अधिक भयानकता यह है कि वहाँ मरनेवाले का क्या होगा! दुसरी बात यह है कि पौराणिकोंने नरक का वर्णन कुछ ज्यादा ही किया है ।  लोगों को ऐसा लगता है कि हम नरक में जाएंगे और वहाँ यमराज हमें भजिया की तरह तलेगा तो?  तीसरी बात, मृत्यु की अमांगलिकता की सतत पुनरुक्ति ( Hammering )   होती है ।  जैसे कोई मरा हो तो उसे छुआ नहीं जाता, क्योंकि मुर्दा अमांगलिक माना जाता है, उसके कारण मृत्यु भयानक लगती है ।

केवल गीता ही मृत्यु का अनुदर्शन करने को कहती है । गीता कहती है कि मृत्यु अमांगलिक नही है । सुबह उठने पर बिस्तर में ही मृत्यु का स्मरण करना चाहिए, मगर हम वैसा नहीं करते। गीता कहती है: ‘जन्ममृत्युजराव्यधि दु:ख दोषानुदर्शनम्’-जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि वगैरह का अनुदर्शन करना चाहिए ।  व्यावहारिक लोगों ने मृत्यु को अमांगलिक ठहराया है । शास्त्रकार मृत्यु को अमांगलिक नही ठहराते । आप बाहर जाने के लिए निकले हैं तभी सामने कोई मुर्दा दिखाई दे तो शकुन माना जाता है ।

कितने  ही लोग डर के कारण ऐसा मानते हैं कि मृत्यु का विचार ही नहीं करना चाहिए। मृत्यु में ऐसा क्या है? उसमें स्वयं अपनी ही विस्मृति है ।  उसके कारण मृत्यु का डर सताता है । वित्त, विद्या या कीर्ति के वैभव से  कोई बडा वैभव होगा तो वह ‘मै हूं’ का वैभव है    मृत्यु  में ‘मैं हू’ यही चला जाता है।  एकाध आदमी को रात में स्वप्न आता है कि उसे सिंह फाडकर खाता है ।  उसे पसीना छूट जाता है इतने में उसकी आंखे खुल जाती है ।  आँख खुलते ही उसे किसी चीज का आनन्द होता होगा तो वह ‘मै हूं’ का होता हैै ।  वह आनन्द सबसे बडा है । मृत्यु में वह आनंद चला जाता है ।  इसलिए मृत्यु भयानक लगती है । मृत्यु की भयानकता खत्म करने के लिए जहाँ जाना है वहाँ सम्बन्ध होना चाहिए ।  दूसरे में, वहाँ सारी व्यवस्था होनी चाहिए । ‘अनायासेन मरणम्’ मरण अनायास होना चाहिए, उसके लिए रास्ता दिखाओ ।

मृत्यु ही एक ऐसी घटना है जिसका विचार करने से जीवन का सच्चा अर्थ मालूम पडता है । तुम्हे जीवन समझना हो तो मृत्यु को समझना होगा ।  तुम जब तक मृत्यु को समझ नहीं पाते तब तक जीवन को भी समझ नहीं पाओंगे ।  मृत्यु अति आवश्यक बात है ।  मगर वह किसी को नहीे चाहिए इसलिए सभी को उससे नफरत है ।  प्रयाणकाले मनसाचलेन - अचल अन्त:करण से मनुष्य को प्रयाण करना है ।

मन की चंचलता भीति और भोग से आती है ।  जहाँ भोग ज्यादा होते हैं वहाँ चंचलता प्रभावी होती है ।  मनुष्य को भोगांक्षा होती है, जिसे मोटर, बंगला, पत्नी वगैरह छोडकर जाना पडता होगा उसकी स्थिति कैसी होगी? जो स्थिति से गुजरे हैं वे अपनी स्थिति कहने के लिए आते नहीं, यह दु:ख की बात है ।  यह बात सच है कि इन सब को छोडकर जाना कठीन है ।

मरते समय चंचलता रहती है और गीता कहती है अचलेन मनसा-मन अचल होना चाहिए । एक बार एक वृद्धा अंतिम साँसे ले रही थी तब उसको हेमगर्भ (सुवर्ण) की एक मात्रा दी गई, ताकि उसे यदि कुछ अंतिम कहना हो तो कह सके ।  होशमें आने पर उसने देखा कि दीपक की बत्ती अधिक बढी हुइ है इसलिए  उसने कहा बत्ती तनिक कम कर दो।’  ‘बत्ती अधिक बडी होने से तेल अधिक जल रहा है’ यह बात उसके ध्यान में आयी ।  अर्थात् इस बात में उसका मन अचल था ।  प्रयाण काल में मूर्खों का भी मन अचल होता है परन्तु देह त्याग करते समय जो भगवान का और भगवद्कार्य का चिंतन करता रहता है, वही अचल मनवाला है, ऐसा गीताकार का कहना है । गीता कहती है कि मन अचल रहना चाहिए, परन्तु वह किस प्रकार अचल रहना चाहिए? तो भक्त्यायुक्त: भक्ति से युक्त अचल होना चाहिए, मूर्खता या अज्ञानता से नहीं ।  तू भक्त्यायुक्त: भक्तिपूर्वक तप करता होगा, प्रभुका कार्य करता होगा और प्रभु के निमित्त घिसता होगा तो मन अचल होगा ।

किसी भी स्थिति और समय में जो भगवान को नहीं छोडता और जो भक्ति रस से आद्‍र्र हो गया है, जिसने जीवन का रस नहीं खोया है, उनका अन्तकाल होता है ।  वाल्मीकि, याज्ञवल्क्य और वशिष्ठ जैसोंका अन्तकाल और शंकरलाल, रामलाल, गोविंदभाई आदि सर्व साधारण मनुष्योंका प्रयाणकाल कहलाता है ।  जो अन्तकाल में गया वह वापस आनेवाला नहीं है ।यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।’

मृत्यु की भयानकता निकालनी है ।  इतना ही नहीं, मृत्यु को जीतना है । मृत्यु को आमने सामने ( Face to face ) देखना है, और उसका रुप बदलना है ।  इस बात को हम मानवी जीवन में ही कर सकते है ।  ‘अतिमृत्युमेति नान्य: पन्था: विद्यतेनाय’ अन्त मे, मानव का मन तथा बुद्धि ही मृत्यु का करनेवाले हैं ।  उन्हे मृत्यु का डर नहीं लगना चाहिए ।

मृत्यु के सामने मन तथा बुद्धि को ले जाना है ।  उनकी छाती में हिम्मत खडी करनी चाहिए ।  हमारे शास्त्रकारोंने कहा है कि मन और बुद्धि को रोज पंचामृत से स्नान कराना चाहिए । हम भगवान को पंचामृत से स्नान कराते है । मगर पंचामृत तैयार करती है घरवाली तथा स्नान कराता है पुरोहित महाराज और सेठ तो गद्दी पर बैठा रहता है ।

ज्ञान, ऐश्वर्य, बल, धैर्य तथा तेज ये पाँच मिलकर पंचामृत होता है । इस पंचामृत से मन तथा बुद्धि को स्नान करायेंगे तो मन बुद्धि में हिम्मत आएगी। मृत्यु को जीतने का कौनसा मार्ग है? तो कहते हैं : ‘तमेव विदित्वा’ उसे (परमेश्वर को) जानना चाहिए, परन्तु उसे कौन जान सकता है? जिसने इसे अग्नि के रुप में देखा, जिसने इसे जल में देखा, वही इसे जान सकता है ।  वही अविद्या को जलानेवाला है ।  यह बात दृढ होनी चाहिए ।  भगवान ने गीता में कहा है:
दैवी हेषां गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।।(गीता 7-14)
(इस दैवी त्रिगुणोंयुक्त मेरी माया को दु:ख से अवश्य पार किया जा सकता है ।  जो मेरी शरण में आते हैं वे माया पार करते हैं)

एकाध कुत्ता जब काटने आता है तब उसके साथ झगडना बुद्धि शून्य आदमी का काम है । बुद्धिशाली आदमी कुत्ते के मालिक को हाक मारता है ।  वह आकर कुत्ते को मना करे तो कुत्ता काटता नहीे । इसीतरह माया मुझे तकलीफ देती हो तो मुझे उसके साथ झगडना नहीे है ।  तमेव विदित्वा जिसकी माया है उसे बुलाओ यदि वह माया से कह देगा तो माया तकलीफ नहीे देगी । अविद्या तकलीफ देती हो तो उसके मालिक को हाक मारो वही अविद्या का नाश करेगा ।

अन्त:करण के विशुद्ध बननेपर भगवान उसमे बसते है ।   हमारे अन्तकरण मेे (हृदय मेे) भगवान हैे ।  मगर परिपूर्ण रुप से नहीे है ।  क्यों? सलिले संनिविष्ठ: शुद्ध अन्त:करण में भगवान बसते हैं ।  उसके लिए अन्त:करण की शुद्धि आवश्यक है ।  प्रथम अन्त:करण शुद्ध होना चाहिए, उसे तेजस्वी बनाना चाहिए और दैवी बनाना चाहिए ।

भगवान को जानना है, मगर उसे कौन दिखायेगा? इसके लिए दो विचार प्रभावी हैं ।  एक कोई मुझे भगवान दिखाएगा और दूसरा मेरा भाग्य खुलेगा तब भगवान मेरे पास आयेंगे । मुझे कोई भगवान दिखाएगा ऐसा समझकर भगवान दिखानेवाले के पीछे लोग भागते हैं । ‘फलाना भगवान दिखाता है’ समाधि लगता है’ ऐसा कितने ही लोग कहते हैं । उनसे कहना चाहिए कि समाधि तुझे लगानी है, उसे नहीं ।  ये लोग मूर्ख होते हैं वे सुनते नहीं ।  सट्टे में पैसे कमानेवला आदमी व्यापार नहीं कर सकता, इसका कारण उसे पैसे जल्दी चाहिए । उसे धीमे धीमे पैसे मिलना अच्छा नहीं लगता ।  हम भी सट्टेवाले की वृत्ति के हो गये हैं ।  हमें गीता की प्रगमनशील विचार धारा (Progressive idealism) मान्य नहीं है ।  हम भगवान दिखानेवाले को ढूढ रहे हैं ।  परन्तु हम यह विचार नहीं करते कि क्या भगवान प्रदर्शन की वस्तु है? ‘मुझे कोई भगवान दिखाएगा’ ऐसा मनानेवाला एक वर्ग है ।  दूसरा एक वर्ग है जो ऐसा मानता है कि मेरा भाग्य खुलेगा तब भगवान मुझे दर्शन देंगे ।  इन दोनो विचारो से मानवी जीवन खोखला बन गया है ।  जिसका जीवन खोखला है वह भगवान के पास नहीं जा सकता ।  कृष्ण भगवानने गीता गायी है ।  गीता ही एक ऐसा ग्रंथ है जो आदमी को कमजोर नहीं बनाता । 

भगवान को माननेवाले काफी लोग हैं मगर गीताने एक बात बहुत अच्छी तरह से कही है कि भगवान तुम्हारे लिए काम नहीं करते बल्कि तुम्हारे साथ काम करते हैं (He does not work for you, He works with you )   सभी को लगता है कि भगवान मेरे लिए कुछ करें मगर गीता कहती है कि तुम कुछ करोगे तो वह आएगा ।  वह तुम्हारे साथ काम करता है यह पक्तिं रेखंकित करने जैसी है ।  इसमें गीता के सारे तत्वज्ञान का पता चलता है ।

इसका अर्थ ऐसा नहीं कि भगवान की मदद के बिना तुम आगे बढ सकते हो ।  वह तुम्हारे साथ काम करता है ।  (He works with you) इसलिए उसे अगर सक्रिय (Active) करना होगा तो तुम्हे भी सक्रिय बनना पडेगा ।  ‘ऋते श्रान्तस्य न सख्याय देवा:’ मेहनत किये बिना भगवान सख्य नहीं रखता ।

अन्तकरण: शुद्ध बनना बहुत बडी बात है ।  भगवान को पहचानने का प्रयत्न करना है । हम पुराण पढते हैं मगर गीता नहीं पढते ।  इसका कारण गीता प्रत्येक को साधना करने को कहती है । पुराण कहते हैं कि मरते समय ‘नारायण’ बोलोगे तो यमदूत की जगह विष्णुदूत आयेंगे पूराणें में मुक्ति सहज मिलती है, ऐसा समझकर लोग पुराण पढते हैं ।

मृत्यु रुपी संसार समुद्र में अमरत्व की प्राप्ती कैसे हो सकती है? इस विषय में ऋषि हमें समझाते हैं सृष्टिमें जन्मे सभी मरणशील हैं ।  यहाँ की हवा ही ऐसी है कि स्वयं भगवान भी यहाँ आएं तो उनको भी जाना पडेगा ।  जो भी नियम है उनका पालन स्वयं भगवान भी करते हेै । ऐसे मरणशील संसार मेे अमरत्व की प्राप्ती कैसे हो सकती है ।

ऋषि तो आत्मविश्वास से कहते हैं कि यही एकमेव रास्ता है । तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति-उसे जानकर अमृतत्व की प्राप्ती हो सकती है । उसे जानना चाहिए ऐसा पहले कहते हैं ।  यह रीढ की ही है ।  इसलिए परिश्रम करके पहले तुम्हे भगवान को जानना पडेगा । जिसे जानने के बाद व्यक्ति को अमृतत्व मिलता है वह ब्रम्ह है ।  ब्रम्ह जानने के बाद व्यक्ति अमर बन जाता है ।  वास्तव में आत्मा तो अमर है ही, गीता के दूसरे अध्याय में भी भगवानने  आत्मा को अमर कहा है:
अच्छेद्योयमदाहोयमक्लेद्योशोष्य एव च ।
नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोयं सनातन: ।।
                       (गीता 2-24)
(आत्मा शास्त्रों से नहीं छेदा जा सकता, अग्नि से जलाया नहीं जा सकता, पानी से भिगाया नहीं जा सकता, पवन से सुखाया नहीं जा सकता, क्योंकि यह आत्मा नित्य, सर्वत्रव्याप्त, स्थिर अचल और सनातन है)
आत्मा अमर है, मगर देह के संपर्क से वह मरणशील लगता है । शरीर से हम पृथक््  हैं इसके अनुभव की कल्पना ज्ञान से आती है, तब आत्मा मरणशील है यह विचार मन से निकल जाता है ।  ज्ञान के अलग अलग परिणाम होते हैं ।  शरीर से पृथक् अस्ति, जायते, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यते- होना, जन्मलेना, बढना, जवान होना, वृद्धत्व आना और मृत्यु, देह के ये छ: विकार हैं ।

जो अनात्मा हैं उसे ये षड्भाव लागू होते हैं ।  हमारे शरीर पर ये षड्भाव लागू होते हैं । इन षड्भाव युक्त शरीर से मैं पृथक्् हूँ ऐसा यदि आदमी को लगा तो यह बडी बात है । यज्ज्ञात्वा मृतमनुते- यहाँ दो बातें समझायी है ।  पहली बात यह है कि मैं शरीर से पृथक हूँ ऐसा मनुष्य को लगे और दूसरी बात मनुष्य में रहा मृत्यु का डर निकल जाए ।  अमृतमनुते यानी उसकी मृत्यु आएगी परन्तु मृत्यु का डर नहीं रहेगा ।  गीता में कहा है: ‘जातस्य हि धु्रवो मृत्युर्धुवं जन्म मृतस्य च’ ।  एकाध अत्यंन्त प्रभावशाली आदमी के मरने पर उसे हम मरा नहीं कहते बल्कि उस दिन को हम ‘पुण्यतिथि’ कहते है’ ।  हमारे यहाँ भी  .ष्ण जयंती के समान ही मान्य नेताओंकी जयन्ती मनाते हैं। कृष्ण और राम की जयन्ति होती है किन्तु उनका मृत्यु दिन नहीं होता और उनका किसी के साथ विलय (Merging) भी नहीं है , क्योंकि वे भगवान का स्वतंत्‍र्य रुप लेकर आये थे ।

तुकाराम महाराज, ज्ञानेश्वर महाराज जैसे सन्तों की पुण्यतिथि होती है, जिस दिन यह शरीर छोडकर इन पुण्यात्माओं का चैतन्य प्रभु में विलीन हो गया वह उनकी पुण्यतिथी कहलाती है । उनका मरण नहीं है।  जो मरते हैं उसका पुनर्जन्म होता है, परन्तु जो मरा नहीं , विलीन हो गया उसको पुनर्जन्म नहीं है । इसलिए हमारे देश में सन्तो की जयन्ती नहीं मनाते हम केवल राम और .ष्ण की जयन्ती मनाते हैं ।  लोगों को उसमे का सात्विक रहस्य-भेद मालूम न होने से वे कहते हैं कि राम की जयन्ति मनाते हो तो हमारे नेताओं की क्यों नही?
जीवन के अन्दर दो प्रवाह है ।  एक भोग का प्रवाह है दूसरा दैवी जीवन का प्रवाह है । भोग का प्रवाह व्यावहारिक जीवन का प्रवाह है ।   खाना-पीना, स्त्री, वित्त, लडके, लडकियाँ, जवांई वगैरह सब व्यावहारिक जीवन में आता है ।

दूसरा एक दैवी जीवन है ।  दैवी जीवन में मनुष्य को किसी के लिए आदर होता है । करुणा, शुचित्व ये सारी बातें दैवी जीवन में आती है ।  मनुष्य को शुचिता अच्छी लगनी चाहिए तथा उसे उठाना चाहिए ।  मनुष्य को स्वच्छ जीवन जीने की आसक्ति लगनी चाहिए । कृतज्ञता भी दैवी जीवन में आती है ।

व्यावहारिक जीवन यजज्ञात्वा भगवद्तत्व को जाने बिना भी हो सकता है ।  मगर दैवी जीवन यज्ज्ञात्वा के बिना नहीं हो सकता है ।  अमृतमनुते उसे जानकर मनुष्य अमृत बन जाता है । ये सभी महत्वपूर्ण बाते हैं ।  यह केवल गीता का ही कहना नहीं है बल्कि उपनिषद्, महात्माओं और संतो का भी यही कहना है ।  इसीलिए तुलसीदासजी कहते हैं, ‘अन्तकाल रघुवर पुर जाई जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई।’

अमरत्व, अजरत्व और अभयत्व- इन तीन बातों से दैवी जीवन बनता है । भगवद्तत्व जानने के बाद ही ये तीन बातें आयी है ।  अमरत्व अर्थात् मरने का डर समाप्त हो जाएगा ईशाभिलाषा अविनाशी रहेगी ।  श्रद्धा का दीपक पल पल मे बुझ जाता है ।  शुरुआत मे दो चार बार आदमी भगवान  का काम करता है फिर उसकी श्रद्धा के दीपक को कोई फूँक मारे तो दीपक बुझ जाता है । कौन फूँक मारेगा कहा नहीं जा सकता ।  पडोसी, मित्र अथवा घरवाली भी फूंक मारे तो भी श्रद्धा का दीपक बुझ जाता है । हमें अपनी श्रद्धा का दीपक सँभालना है ।

यहाँ दैवी जीवन प्रवाह की मांग है ।  जो अन्दर है उसीको उद्दिपित करना है, पुष्ट करना है, और उसे मोड देना है । दूसरी बात आदर ( Reverence ) है ।  किसके प्रति कितना आदर और कैसा आदर रखना चाहिए इसका विचार करना चाहिए ।

किसी को अभिनेता के प्रति आदर होता है, किसी को क्रिकेट के खिलाडी के प्रति आदर होता है । तुम्हारे आदर का स्थान जितना छोटा होगा उतना ही तुम छोटे रहोगे ।  जितना तुम्हारे आदर का स्थान उच्च होगा उतने ही तुम उच्च होंगे ।  आदर, .तज्ञता, शुचिता, प्रेम वगैरह से अन्दर के जीवन प्रवाह को पुष्ट करना चाहिए, प्रभावी करना चाहिए और उसे मोड देना चाहिए ।

साधक की ईशाभिलाषा अविनाशी होती है हमें भगवान प्राप्त करने की इच्छा होती है । श्रावण मास की शुरुवात में सभी को भगवान की इच्छा होती है ।  सभी बिल्वपत्र चढाते हैं, उपवास करते हैं, रोज नहाकर शंकर के मंदिर में दर्शन करने जाते हैं, परन्तु उनकी ईशाभिलाषा अविनाशी नहीं है बल्कि विनाशी है।  वह अधिक समय तक नहीं टिकती ।  जो अभिलाषा किसी भी परिस्थितिमें किसी भी वृत्ति में टिकी रहती है और बढती है तो वह अविनाषी है ।

ईशभिलाषा सुख में रहती है, दु:ख में रहती है, बचपन में रहती है, यौवन में रहती है, बुढापे में रहती है, संपत्ति आए या विपत्ति आए तो भी ईशाभिलाषा अविचल रहती है, उसे अविनाशी ईशाभिलाषा कहते हैं ।  इस प्रकार की ईशाभिलाषा जिसके जीवन में रहती है उसके लिए तुलसीदासजी लिखते हैं कि वह भगवान के धाम जाता है, ‘अन्तकाल रघुवर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ।’  इसलिए हमें ऐसी ईशाभिलाषा को जीवनमें लाने का प्रयत्न करना चाहिए ।